लगातार भागते भागते
बावन का हो गया हूं
बच्चे भी बडे हो गये हैं।
इतने बडे कि मेरी बातें
अब उन्हें छोटी लगने लगी है।
यह जानते हुए कि उनके लिए
मतलब नहीं है मेरी बातों का-
मैं अपनी बातें रखता रहता हूं-
उन्हें यह न लगे कि-
मैं पिता के फ़र्ज में गफ़लत हूं।
मुझे अपने पिता से मिला है
इसलिये डाकिये की भांति डाक लगाता हूं
यह सोचकर कि-
यह बेरंग लिफ़ाफ़ा न बने
जिसे लौटा दिया जाय्।
मैंने भी अनुभव की वसीयत से पाया है-
संस्कारों का एक लिफ़ाफ़ा
जिसे धरोहर के रुप में
आज तक संभाले रखा है।
उसे बेरंग डाक की तरह
पिता को नहीं लौटाया है।
एक दिन जरुर आयेगा
मेरे बच्चे भी मुझे न लौटाकर
अपने बच्चों के लिये
संभालकर रख लेंगे उसे
अनुभव की पोटली में।
वह दिन-
मेरी खुशी की
दीवाली का दिन होगा।
गुरु तो गुरु ही होता है!!
4 weeks ago
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