जेठ का महिना
आग बरसाता सूरज
सूखी-तपती धरती
मृतप्राय नदियां
उजडे जंगल
पानी तलाशते प्राणी
हवा के रुख के साथ उडते-
पेडों से झडे पत्ते
अपनी जीवन यात्रा के अन्तिम पडाव पर
आपस में बतियाते-
खर्र-खर्र-
बचपन से लेकर
अभी तक के अनुभव सुनाते।
खूशबू, कोमलता
और सुन्दरता देते-देते
सूखे-झरे-
पर टूटे नहीं।
आज भी
तत्पर
पदचाप पर बोलते-
कोई हमारे लायक सेवा?
जलाने पर
आग और धुंआ
और दफनाने पर
धरती को उर्वरा देते
पेड से पतझड तक
देते ही देते।
मुफ्त का चंदन घिस मेरे लाला
5 days ago
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